जानिए हिमाचल प्रदेश का वह महोत्सव जिसमें किया जाता है सर्दियों का स्वागत!
हिमाचल प्रदेश की हरी-भरी वादियां और बर्फीली चोटियां देखना कितना दुर्लभ है। लेकिन जब सितंबर का महीना आता है, तो यहां का माहौल एक अलग ही रंगारंग हो जाता है। यहां का सैर महोत्सव, जिसे हिमाचल सैर महोत्सव भी कहते हैं, इसी समय मनाया जाता है। यह त्योहार नई फसल की खुशी और सर्दियों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। हिमाचल के विभिन्न जिलों जैसे शिमला, सोलन, कुल्लू, मंडी और कांगड़ा में इसे बड़े उत्साह से और धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
आओ जानें इतिहास!
सैर महोत्सव की जड़ें सदियों पुरानी हैं। यह पर्व हिमाचल की आदिवासी और लोक संस्कृति से जुड़ा है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यह समय देवताओं के स्वागत का समय है। वे स्वर्ग से आते हैं और फसल की रक्षा करते हैं। वैसे इस त्योहार की शुरुआत गांवों में पूजा से होती है। लोग साफ-सुथरे कपड़े पहनते हैं, और घरों को कई तरह से सजाते हैं। इस दौरान महिलाएं विशेष पकवान भी बनाती हैं, जैसे सिड्डू और बाबरू। हिमाचल का यह महोत्सव सिर्फ जश्न नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक माना जाता है।

हिमाचल के लोग फसल को देवताओं का आशीर्वाद मानते हैं। इसलिए सैर के दिन वे नाचते-गाते हैं और देवताओं का स्वागत करते हैं। हिमाचल के लगभग सभी गांव सहारों में इस त्यौहार के प्रति उत्सुकता देखी जा सकती है। वे ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हैं, और हवा में लोकगीतों की धुन गूंजती है तो मन खुश हो जाता है। दरअसल, यह त्योहार पारिवारिक और सामुदायिक दोनों रूपों में मनाया जाता है। कुल्लू और मंडी में घर-घर में जश्न होता है, जबकि सोलन और शिमला में बड़े-बड़े मेले लगते हैं। कहा जाता है की महोत्सव की शुरुआत 20वीं शताब्दी में लोकप्रिय हुई, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन काल से जमीं हुई हैं। राज्य सरकार भी इसे बढ़ावा देने में पीछे नहीं, हिमाचल सरकार इसे पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रमोट करती है जो हिमाचल के लिए बहुत जरूरी है। पर्यटक यहां आकर स्थानीय जीवन को करीब से देख पाते हैं। सच में यह महोत्सव हिमाचल की विविधता दिखाता है। यहां की संस्कृति में हिंदू, बौद्ध और आदिवासी सभी मिल-जुलकर त्यौहार को मनाते हैं।
सांस्कृतिक रस्में जैसे फिर ज़िंदा हो जाती हैं..
सैर के दिन लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं। महिलाएं रंग-बिरंगी शॉल और चूड़ियां पहनकर सजती हैं। पुरुष टोपी और कुर्ता पहनते हैं। जो बहुत की रोमांचक माहौल बना देता है। त्योहार में बैल दौड़, लोक नृत्य और हस्तशिल्प मेला भी लगता है। अगर आप हिमाचल घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो सैर महोत्सव को मिस न करें। यह एक ऐसा अनुभव है जो आपको हमेशा याद रहेगा। यकीनन सैर महोत्सव हिमाचल की आत्मा है। और यह त्योहार हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ जुड़ना कितना महत्वपूर्ण है।
नाच-गाने इतने खास कि इनमें रम जाएंगे आप!
वैसे तो सैर महोत्सव के मुख्य आकर्षण लोक नृत्य और संगीत हैं। लेकिन सोलन के अर्की में बैल दौड़ बड़ा रोमांच भरा होता है। जब ऊंचे पहाड़ों के बीच सरपट दौड़ते बैल दिखाई देते हैं तो किसी फिल्म के नजारे से कम् नहीं लगता। इस दौरान दर्शक चिल्लाते हैं, तो उत्साह का माहौल बन जाता है। वास्तव में यह दौड़ किसानों की मेहनत का प्रतीक है। और इस महोत्सव में नाटी नृत्य भी होता है जो दर्शकों का ध्यान खींचता है। बात दूं की यह नृत्य हिमाचल का प्रसिद्ध नृत्य है। लोग हाथ पकड़कर घेरा बनाते हैं और सब मिलकर नाचते हैं। महिलाएं लाल-पीले कपड़ों में सजती हैं। तो वहीं पुरुष ढोल बजाते हुए नाचते हैं। यह नृत्य एकता का संदेश देता है।

इसके अलावा कुल्लू और मंडी में देवताओं की पालकी यात्रा निकलती है जो पूरे गांव में खुशी की बहार सी ला देती है। लोग देवताओं को स्वागत करते हैं, यही इस महोत्सव का मुख्य आकर्षण है। पालकी पर रंगीन झंडे लहराते हैं हुए, गीत गाते हुए गलियों गलियों में घुमाया जाता है। जो लोक गीत इस महोत्सव में गाए जाते हैं ये गीत असल में फसल, प्रकृति और जीवन की कहानियां कहते हैं। इन्ही गीतों के बीच कलाकार फ्लूट बजाते हैं, और दर्शक तालियां।
हस्तशिल्प मेला और बोटिंग का अनुभव
एक और बात हस्तशिल्प मेला भी यहां का आकर्षण ही मानिए। इन मेलों में ऊनी शॉल, मोहरी के जूते और चांदी के आभूषण बिकते हैं इन्हें खरीदकर शैलानी अपनी यादें संजोते हैं। इसी दौरान शिमला के आसपास के झीलों पर बोटिंग भी होती है इसे भी आप देख सकते हैं। इसके अलावा सैर महोत्सव में विशेष पूजा भी की जाती है, और भगवान से आशीर्वाद मांगा जाता है। बहुत से लोग उत्सव के समय मंदिरों में जाकर भी प्रसाद चढ़ाते हैं। कुल मिलाकर यह सब दुर्लभ चीजें महोत्सव को मजेदार बनाते हैं। यह सब देखकर ऐसा लगता है जैसे पहाड़ खुद नाच रहे हों, वादियाँ खुद गुनगुना रही हों। पर्यटक इन नृत्यों और गीतों में शामिल हो सकते हैं और यहां की संस्कृति का एहसास कर सकते हैं।
सांस्कृतिक रस्मों और परंपराओं में छिपा है प्रकृति का आदर
सैर महोत्सव में सांस्कृतिक रस्में मुख्य भूमिका निभाती हैं। त्योहार की शुरुआत पूजा से होती है और गांव का पुजारी जो होता है वह देवताओं को बुलाता है। तो लोग फूल, चावल और फल चढ़ाकर अपने लिए आशीर्वाद मांगते हैं। मान्यता है कि यही देवता जिनकी तयोऊहसार के समय पूजा की जाती है वही देवता फसल की रक्षा करते हैं। त्यौहार में महिलाएं विशेष पकवान बनाती हैं। सिड्डू जैसे पकवान जो चावल के आटे से बनता है। और इसे भाप में पकाया जाता है। दूसरा जो पकवान है वह बाबरू जिसे चना दाल से भरा जाता है। ये पकवान देवताओं को चढ़ाए जाते हैं, फिर बाद में पूजा होने के बाद खाए जाते हैं। मतलब यह है कि इसी का फिर प्रसाद बांटा जाता है।

इन सभी परंपराओं में एक और खास परंपरा है जिसमें में बैल को सजाना भी है। किसान बैलों को साफ करते हैं। उन्हें घंटियां बांधते हैं। और फिर पूजा के समय उनकी भी पूजा की जाती है। यह सारी रस्म फसल के लिए आशीर्वाद मांगने की है। हिमाचल के सैर महोत्सव की यह परंपरा संस्कृति को जीवित रखने का काम करती है। सैर में कोई भी किसी भी तरह का कोई भी भेदभाव नहीं सब आपस में मिल-जुलकर इसे मनाते हैं। चाहे हिंदू हो या मुस्लिम सब मिलकर इस जश्न में शामिल होते हैं। यही प्रेम भाव महोत्सव को गहराई देता हैं।
व्यंजनों की खुशबू और राग की राग्नि से सजता है त्यौहार का मजमून
सैर महोत्सव में भोजन का मजा अलग ही है। मेलों के स्टॉल्स पर हिमाचली व्यंजन मिलते हैं जिनको खाते हैं आत्म अनुभव हो जाता है। सिड्डू गर्मागर्म खाने में जो आनंद मिलता है उसका जो तो कोई जबाब नहीं है। वैसे यह चावल के आटे से बनता है और भाप में इसे पकाया जाता है जो इसे बहुत नरम बनाता है यही इसकी खासियत है। बाबरू तीखा और स्वादिष्ट होता है तो चटखार का मजा आप इसे खाकर ले सकते हैं। चना मद्रा भी प्रसिद्ध है जिसे चने और सब्जी दही से बनाया है। इसी के साथ खाने के बाद मीठा न मिले तो सब अधूरा लगे इसलिए मिठाई में गुड़ की रोटी और खीर हैं यहां शानदार भूमिका अदा करते हैं। पर्यटक इनका स्वाद चखते हैं तो वे भी हिमाचल को अपना दिल दे बैठते हैं।
महोत्सव में शामिल होने के लिए क्या करना होगा?
सैर महोत्सव में शामिल होने के लिए आपको ज्यादा कुछ नहीं करना है, आप यदि जाना चाहते हैं तो फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल आपकी मदद के लिए तैयार है, दरअसल यहां पहुँचने के लिए शिमला एयरपोर्ट सबसे नजदीक है। वहां से सोलन या कुल्लू 2-3 घंटे की दूरी पर ही हैं। यहां से बस या टैक्सी लें और पहुँच जाए सैर करते हुए सैर महोत्सव में।
दूसरा विकल्प यह है की चंडीगढ़ एयरपोर्ट से शिमला जा सकते हैं जो 4 घंटे के दूरी पर है। ट्रेन से कालका या शिमला स्टेशन सबसे अच्छा कहा जा सकता है। यहां से बस लीजिए और फिर बस से गांव तक आराम से पहुंचिए।
और यदि सड़क मार्ग से आना चाहते हैं तो दिल्ली से शिमला लगभग 350 किलोमीटर है। इस NH5 से अच्छा कोई दूसरा विकल्प हो ही नहीं सकता है। इस खास मौके पर यानि महोत्सव के समय विशेष बसें चलती हैं जिनसे आप सफर कर सकते हैं। ठहरने के लिए बहुत सारे होटल या होमस्टे मिल जाएगे क्योंकि हिमाचल प्रदेश तो पहले से ही टूरिस्ट हब है।





