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Humayun’s Tomb, Delhi

Humayun’s Tomb- हुमायूँ का मकबरा : मुग़ल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना

मुगलों ने अपने शासन के दौरान मकबरों का निर्माण करते वक़्त शायद यही सोचा होगा की एक दिन वे दुनिया से चले जाएंगे, लेकिन उनके बनाए गए ये मकबरें उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगे। क्योंकि मुगलों द्वारा बनाई हर विरासत बेहद भव्य और आकर्षक है और ऐसे ही एक उत्कृष्ट विरासत की बात आज हम अपनी इस यात्रा में करेंगे।

बाबर के सबसे बड़े बेटे हुमायूँ को हम सभी ने इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा है। लेकिन क्या आपने हुमायूँ का मकबरा देखा है? अगर अब आप ये सोच रहे हैं कि हुमायूँ का मकबरा भी इतिहास के अध्याय की तरह उबाऊ है तो आप गलत हैं, क्योंकि हुमायूँ का मकबरा भारत का पहला उद्यान-मकबरा है जो मुगल स्थापत्य के बेहतरीन उदहारणों में से एक है जिसे 1993 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के रूप में घोषित किया गया था।(Humayun’s Tomb)

दिलवालों की दिल्ली में 1565 ई. में बना हुमायूँ का मकबरा मथुरा रोड़ पर स्थित है। एक बात गौर करने वाली है कि हर हेरिटेज की तरह हुमायूँ का मकबरा किसी बादशाह द्वारा नहीं बल्कि हुमायूँ की बेगम रानी हमीदा बानो ने अपने शोहर की याद में बनवाया था। साथ ही आपको बता दें ताजमहल का निर्माण इसी मकबरे से प्रभावित होकर किया गया था।(Humayun Tomb)

टिकट घर और यहाँ कैसे पहुंचे

जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम मेट्रो स्टेशन से हुमायूँ का मकबरा लगभग 2 किलोमीटर दूर है. अब 2 किलोमीटर का रास्ता आपको 11 नंबर गाड़ी से पार करना है या ऑटो से, ये आप पर और आपकी जेब पर निर्भर करता है।  मकबरे में एंट्री के लिए भारतीय नागरिक की 35 रुपये  और विदेशी सैलानियों के लिए 550 रुपए की टिकट लगती है. टिकट खरीदने के लिए कैशलेस माध्यम अपनाना पड़ता है क्यूंकि नकद भुगतान का विकल्प फिलहाल कोरोना काल के कारण मौजूद नहीं है। टिकट लेते ही सफर शुरू हो जाता है, जिसमें मुसाफिर होते हैं हम, आप और हमारी दिलचस्पी।(Humayun’s Tomb)

किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर

वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों  का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। सर्दियों में ऐतिहासिक इमारतों का दीदार मन को भाता है।

ईसा खान का मकबरा

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हुमायूँ के मकबरे तक पहुंचने की शुरुवात ईसा खान के मकबरें और मस्ज़िद के साथ होती है जो हुमायूँ के मकबरे से 20 साल पहले बनाया गया था। ईसा खान शेरशाह सूरी के दरबार में एक अफगान रईस था। यह मकबरा अष्टकोणीय मकबरा है जो अपनी आकर्षक वास्तुकला से किसी को भी अपना दीवाना बना सकता है।  इसमें लगी छतरियां, चमकदार टाइल्स और जालीदार जालियां इसकी खूबसूरती  को और अधिक  बढ़ाती हैं। ईसा खान के मकबरे के बाहर लगे एक सूचना बोर्ड को पढ़ने के बाद पता चला कि 20वी शताब्दी में यहां पूरा एक गांव आबाद था। वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण देखने के बाद अब हम आगे बढ़ें।  चारों तरफ बस हरियाली ही हरियाली पसरी हुई थी जो पूरी धरोहर को चार-चाँद लगा रही थी।

बू हतीमा गेट

ईसा खान के मकबरे के बाद आता है बू हतीमा गेट। यह विशाल दरवाजा बू हतीमा के मकबरे-बगीचे तक जाता है। रास्ते का अग्रभाग कत्तलदार है और टाइल कार्य के अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं। बगीचे की दीवार के दो उत्तरी बुर्ज़ गुम्बदी छतरियों से सुसज्जित हैं। 19वीं शताब्दी में बगीचे की पश्चिमी दीवार के कुछ हिस्से को तोड़कर प्रवेश द्वार बनाया गया था।

अरब सराय दरवाज़ा

बू हतीमा गेट पार करते ही दाएं हाथ पर अरब सराय दरवाज़ा दिखता है जो लगभग 14 मीटर बड़ा है। इस दरवाज़े को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो हम इतिहास के पन्नो पर वापस लौट गए हों। यह दरवाज़ा हुमायूँ के मकबरे के निर्माण के लिए शिल्पकारों के अहाते की ओर जाता है। लाल पत्थर, सफ़ेद सांगमंरमर, झरोखें और चमक़दार टाइलों के अवशेष से बना ये दरवाज़ा पर्यटकों  को खूब आकर्षित करता है। थोड़ा आगे चलने पर एक और दरवाज़ा आता है।  जिसमें घुसते ही दोनों तरफ हुमायूँ के मकबरे से जुड़े इतिहास के बोर्ड और पुस्तकें देखने को मिलती है। इसी दरवाज़े से सामने देखने पर खूबसूरती के सारे पैमाने लांघता हुमायूँ का मकबरा दिखाई देता है।

हुमायूँ का मकबरा

यकीन मानिये, हुमायूँ का मकबरा तस्वीरों में जितना खूबसूरत लगता है वास्तव में उससे कही ज्यादा है। इतना की शायद ही कोई इसकी ख़ूबसूरती बखान कर पाए।  लाल और सफ़ेद सेंड स्टोन से बनी ये इमारत उतनी ही नायाब है जितना आगरा में बना ताजमहल।  मकबरे के सामने बने फव्वारे की ठंडक को महसूस करते हुए आप जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगें, आपका मन इसकी सुंदरता के वश में कैद होता चला जाएगा।  इस दो मंजिला स्मारक की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते आप महसूस करेंगे की मकबरा पहले से दुगना आकर्षक होता जा रहा है।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं फारसी और तुर्की स्थापत्य शैली के मिश्रण से बना हुआ ये मकबरा लगभग 27 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। हुमायूँ के मकबरे को मुगलों का ‘शयनागार’ भी कहा जाता है। सच मानिए लाल और काले बलुआ पत्थर से बना ये मकबरा बहुत उम्दा विरासत है जिसे आप सभी को देखना चाहिए। आप इस मकबरे के सामने बने उद्यान में बैठकर अपनी थकान मिटाते हुए इसकी मोहकता का रसपान कर सकते हैं।

मन ऐसा हो रहा था मानो इस अद्भुत विरासत को एक बार शुरू से दुबारा घूमूँ।लेकिन 3 घंटे होने में बस 5 मिनट ही बाकी थे जिसके कारण मुझे न चाहते हुए भी मकबरे को अलविदा कहना पड़ा। आपको बता दूं इन दिनों शायद कोरोना महामारी की वजह से एंट्री के बाद मकबरे में 3 घंटे तक ही रहने की अनुमति है। शायद मकबरें में ज्यादा भीड़ न हो इस वजह से। बाहर निकलते ही चटनी और भुट्टे की ख़ुश्बू आ रही थी। मैंने भुट्टा लिया और मकबरे को अलविदा कह अपने कदम बढ़ा दिए घर की तरफ। (Humayun’s Tomb)

Written & Edited by Pardeep Kumar

 

glimpse of Humayun Tomb…best monument of Mughals. The world heritage

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