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चार धाम यात्रा- यमुनोत्री,गंगोत्री,केदारनाथ और बद्रीनाथ

Uttarakhand Char Dham Yatra

भारत में लगभग लाखों-करोड़ों की संख्या में छोटे-बड़े धार्मिक स्थल हैं। इन्हीं में शामिल है देव भूमि कहे जाने वाले उतराखंड की गोद में चारधाम। चारधाम मुख्य रूप से हिंदू धर्म के चार पवित्र स्थलों से संबंधित है। जो इस प्रकार हैं यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ। इन्हीं चार पवित्र स्थलों को देखने के लिए यहां पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। 2023 के आंकड़ों के अनुसार 55 लाख श्रद्धालु निकले थे चारधाम यात्रा पर।

यमुनोत्री

सबसे पहले हम बात करेंगे यमुनोत्री मंदिर के बारे में। जो चारधाम मंदिर में अपनी एक अलग पहचान के लिए जाना जाता है। यह मंदिर चारधाम स्थानों में से एक मुख्य स्थान है। यमुनोत्री मंदिर मां गंगे के लिए समर्पित है। मंदिर मां गंगा के तटपर सुशोभित है, जिसके दर्शन करके श्रद्धालु खुसमय महसूस करते हैं। यह मंदिर गडवाल हिमालय से देखने पर पश्चिम किनारे पर दृष्टिगोचर होता है और उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में यह मंदिर स्थापित है। भारत में दूसरी सबसे साफ़ और पवित्र कही जाने वाली नदी यमुना।  यही से अपना सफर प्रारंभ करती है और प्रयागराज में मां गंगा से संगम कर लेती है। यहीं यमुनोत्री में मां यमुना का पवित्र मंदिर कालिंदी घाटी के शिखर पर और बंदरपूंछ पर्वत के किनारे पर स्थित है। मंदिर के नजदीक ही मां यमुना की काले संगमरमर पत्थर से बनी दुर्लभ मूर्ति खड़ी हुई है। इस मंदिर के निर्माण का श्रेय टेहरी के राजा नरेश सुदर्शन शाह को जाता है। जिनके नेतृत्व में यह मंदिर 1839 में निर्मित करवाया गया था। शर्दियां का मौसम आने पर मां यमुना के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। अप्रैल मई में मां यमुना फिर से अपने कपाट वैदिक मंत्रों और उत्सव, अनुष्ठानों के बाद खोलती हैं, और श्रद्धालुओं को आत्मा तृप्ति का वरदान देती हैं। मां यमुना के आसपास कई छोटे बड़े कुंड हैं। इन्हीं में से एक है सूर्य कुंड। यह पहाड़ों और मिट्टी की तपन को अपने साथ लेकर खोलते हुए पानी के रूप में धारण करता है। भक्त इसी खोलते पानी में चावल और आलू को पांच मिनट के लिए रखकर फिर उसको प्रसाद के रूप में स्वीकार करते हैं

यमुनोत्री मंदिर में प्रवेश के पूर्व श्रद्धालु स्तंभ शिला के दर्शन कर आगे बढ़ते हैं। मां यमुना का यह दुर्लभ स्थान समुद्र से लगभग 3,291 मीटर ऊंचाई पर बना हुआ है। यह स्थान संत असित मुनि से जुड़ा हुआ है। आध्यात्मिक केंद्र कहे जाने वाले इस स्थान में मां गंगा की पवित्रता और इसका शांत बहाव मनमोहक और आकर्षक प्रतीत होता है। इस दिव्य जगह पर बसंत पंचमी, फूल देई, ओलगिया के त्यौहार बड़ी धूम धाम से मनाए जाते हैं। यमुनोत्री की यात्रा श्रद्धालुओं की आस्था के लिए एक भव्य स्थल है। यहां स्नान करने से श्रद्धालु पाप मुक्त होते हैं।

गंगोत्री

चारधामाें में से एक गंगोत्री, उत्तरकाशी जिले में एक छोटा शहर है, इसी छोटे और आकर्षक शहर के मध्य में स्थित है, गंगोत्री मंदिर।  जो अपनी अकाट्य, सुंदरता के लिए जाना जाता है। ऋषिकेश से महज़ 12 घण्टे यात्रा करने पर यह पवित्र स्थल गडवाल हिमालय के ऊंचे शिखर, गिलेशियारों और जंगल के बीच में स्थित है। मां गंगा अपने इर्द गिर्द इतनी सुंदरता समेटे हुए हैं की मानो स्वर्ग का द्वार यहीं से शुरू होता है। भारत के सभी हिन्दू धार्मिक स्थलों में से एक गंगोत्री सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बसा हुआ स्थल है। किवदंतियों के अनुसार भगवान शंकर ने मां गंगा को स्वर्ग से अपनी जटाओं द्वारा मुक्त किया था। कितने आश्चर्य और प्रसन्नता की बात है की मां गंगा का उद्गम स्थल गोमुख है, जो गंगोत्री से उन्नीस किलोमीटर दूर स्थित है। यहां आप बस ट्रैकिंग द्वारा ही पहुंच सकते हैं क्योंकि यह काफ़ी दुर्लभ रास्ता है। अन्य कहाबत अनुसार माना जाता है की महर्षि भागीरथी ने कठिन तपस्या कर मां गंगा को स्वर्ग से धरती पर आने के लिए मजबूर किया था। गंगा नदी से बहुत सारी पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। जो अपने आप में अदभुत हैं। मंदिर में स्थित है, गर्भगृह उसी गर्भगृह में मां गंगा की मूर्ति चांदी की पोशाक पहने हुए विराजमान हैं, मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व श्रद्धालु पहले गंगा के कंचन पानी में स्नान करते हैं। और स्नान करने के पश्चात वह मंदिर में प्रवेश कर मां गंगा के दर्शन करते हैं। दर्शन कर श्रद्धालु मन की शांति से परिचित होते हैं। यहां का वातावरण सुंदरता के सभी आयामों से लिप्त है।

केदारनाथ

Uttarakhand Char Dham Yatra

केदारनाथ बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र पावन स्तंभ है। जो गिरिराज हिमालय के केदार नामक पर्वत पर बना हुआ है। केदार घाटी को हम मुख्य रूप से दो भागों बटा हुआ देखते हैं। एक नर और दूसरा नारायण चोटी। भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक नर और नारायण ऋषि की तपोभूमि के रूप में जानते हैं। केदारनाथ उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। इसे अर्धज्योतिरलिंग भी कहा जाता है। यहां पर स्थित स्वंभू ज्योतिर्लिंग अतिप्राचीन और भव्य है। माना जाता है इस मंदिर का निर्माण जन्मेजय ने कराया था। और इसका जीर्णोद्वार आदिशंकराचार्य ने किया था।

Uttarakhand Char Dham Yatra

सर्वप्रथम इस मंदिर का निर्माण पांडवो ने करवाया था। प्रकृति के बदलाव और भौगोलिक स्तिथियों के परिवर्तन के कारण यह मंदिर खंडर के रूप में तब्दील हो गया था। लगभग 400 से 500 वर्ष तक यह मंदिर बर्फ में दफन रहा। जिसके बाद आदिशंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया था। आदिशंकराचार्य की समाधि आज भी इस मंदिर के पिछले भाग में बनी हुई है। इस मंदिर को लगभग 8 वी शताब्दी ईसा पूर्व बनाया गया था।

यहां की खास बात यह है कि  दीपावली पर्व के दूसरे दिन शीतऋतु के प्रारंभ होने पर मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। और इस मंदिर में एक भव्य दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है। जो लगभग 6 महीने तक मंदिर बंद रहने तक वैसे ही चलता रहता है, और छः महीने बाद जब मंदिर के कपाट खुलते हैं तो भारी संख्या में श्रद्धालु इस दीपधूप को लेने जाते हैं, और भगवान की पूजा आराधना कर स्वयं को भगवान के श्री चरणों में समर्पित कर देते हैं। हिमाचल की गोद में केदारनाथ के इस भव्य मंदिर में प्राकृतिक विपत्तियां मड़राती रहती हैं। मंदिर के इतिहास में ऐसी कई आपदाएं घटित हो चुकी हैं। जिन पर बॉलीवुड ने फिल्में भी बनाई हैं। एक फिल्म तो केदारनाथ नाम से ही बनी हुई है। जिसके अभिनेता सुशांत राजपूत और अभिनेत्री सारा अली ख़ान थीं।

बद्रीनाथ

Uttarakhand Char Dham Yatra

भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर सौंदर्य, शुद्ध वातावरण, बर्फ सुंदरता, अलकनंदा नदी की छलचलाहट प्राकृतिक सौन्दर्य आदि से परिपूर्ण है। यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहां साल भर में लोग सबसे ज्यादा देखने जाते हैं। वैसे तो इस मंदिर में अनेक देवी देवताओं की मूर्तियां हैं लेकिन भगवान विष्णु की एक काले संगमरमर से बनी एक मीटर ऊंचाई वाली यह मूर्ति दुर्लभ और आकर्षक है। मंदिर में सूर्यकुण्ड जैसे एक तप्तकुंड है जो ओषधिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां पर साल में अनेकों भव्य मेलों का आयोजन होता है। जिसका लुत्फ उठाने के लिए पर्यटक और श्रद्धालु हमेशा आतुर रहते हैं।तथाकथित शब्दों के अनुसार इस मंदिर के निर्माण का श्रेय भी आदिशंकराचार्य को दिया जाता है। किबदंतियों के अनुसार भगवान विष्णु एक ऐसे स्थान की तलास कर रहे थे। जो शान्ति का केन्द्र हो जहां वह ध्यान कर सकें। तब भगवान विष्णु बद्रीनाथ नामक इस पवित्र स्थान को चुना था। भगवान विष्णु ध्यान में इतने लीन थे कि उनको हिमालय की कड़कड़ाती सर्दी का बिल्कुल अहसास नहीं हुआ। तब माता लक्ष्मी ने उनकी सुरक्षा के लिए स्वयं को बद्री ब्रक्ष बना लिया। जिसके बाद भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर। इस देव भूमि को बद्रीकाश्रम नाम दिया था।

इस पवित्र स्थल के कुछ प्रमाण पुराणों में भी दिए गए हैं। मंदिर मौसम  की मार के कारण शर्दियों के समय में बंद कर दिया जाता है। मंदिर में भव्य आरती प्रज्वलित की जाती है और यह आरती श्रद्धालुओं के भाग्य खोल देती है। इस आरती में इतनी आकर्षक ध्वनियों की आवाजें, दीपों की वह लहलहाती धूप और पुजारियों के मंत्र पाठ करने की कला अमूर्त होती है।

चारधाम यात्रा के लिए पंजीकरण कैसे करें –

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