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पांडुपोल हनुमान मंदिर जो बयां करता है, पांडवकाल की अमर गाथा- मेरा सफरनामा

हर जगह आप अपनी मर्जी से नहीं जा सकते। कुछ जगहें ऐसी भी होती हैं कि जब तक आपकी डोर नहीं खिंचेगी तब तक शायद आप वहाँ नहीं जा सकते और वैसी ही एक जगह है मेरे अपने शहर, अलवर में। अभी कुछ दिनों पहले मैं गई हुई थी अपने होमटाउन, वैसे तो वहाँ काफी जगहें हैं घूमने जाने के लिए, अपना दिन एक तय तरीके से हंसते गाते बिताने के लिए। और वो जगह थी, प्राचीन हनुमान मंदिर। ‎पांडुपोल हनुमान मंदिर जो कि पांडवों के समय का मंदिर है। एक ऐसी जगह जो मेरी स्मृतियों में सदा जीवंत रहेगी। जिसकी कहानियां और किस्से मैं अक्सर लोगों को सुनाया करूंगी। क्योंकि ये मंदिर मुझे सिर्फ ईश्वर की प्रतिमा ही नहीं उनसे जुड़ी अप्रतिम गाथा का भी बोध कराता है।

हनुमान मंदिर

इसके बारे में और कुछ जानने से पहले आइए चलिए हम थोड़ा इसके इतिहास में झांक कर देखें और जाने कि ये मंदिर यहां कैसे स्थापित किया गया।
‎यह उस समय की बात है जब महाभारत काल में पांडव अपना अज्ञातवास काल व्यतीत कर रहे थे और यहां रुके थे, उसी दौरान इस मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा ही किया गया था। यह मंदिर राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का टाइगर रिजर्व से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। यहाँ हनुमान जी की प्रतिमा उनके लेटे हुए स्वरूप में है। यह हरियाली, शांत वातावरण और ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच स्थित एक ऐसा मनमोहक मंदिर है, कि जितनी भी बार इस मंदिर में जाके हनुमान जी (जिन्हें हम प्यार और श्रद्धा से बाबा कहते हैं) के दर्शन कर लो मन ही नहीं भरता।

हनुमान मंदिर

किंवदंती है कि यहीं पर हनुमान जी ने पांडु पुत्र भीम का घमंड तोड़ा था। वे एक वृद्ध वानर रुप में रास्ते में लेटे हुए थे और भीम वहां से जब गुजर रहे थे तब उन्हें वह रास्ता पार करने के लिए वानर स्वरूप हनुमान की पूंछ हटानी थी जो कि वह अपना पूरा बल लगाने के बाद भी टस से मस नहीं कर सके और उन्हें अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी। तथा इसके बाद हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिए और पांडवों ने उन्हें यहां उनका मन्दिर स्थापित करवाया।

यह मंदिर धार्मिक आस्था का केंद्र है और इसका प्राकृतिक सौंदर्य पर्यटकों को आकर्षित करता है। ‎और अगर आप मानसून के दौरान (जुलाई से सितंबर माह) यहाँ जाते हैं तो आपको बहुत सावधानियाँ बरतने की जरूरत होती है। यहाँ आप दुपहिया एवं चौपहिया वाहन से या फिर पैदल भी जा सकते हैं।
‎भाद्रपद मास में बाबा का मेला भी लगता है जिसमें श्रद्धालु दंडौती (दंडवत) देते हुए भी मंदिर तक जाते है एवं वहीं स्नान आदि कर दर्शन कर भंडारे में प्रसादी भी ग्रहण करते है।

हनुमान मंदिर

बारिश के पानी से वहाँ पेड़ पौधों एवं पहाड़ों में एक अलग ही चमक, मानो जैसे आँखों को एक अलग ही सुकून प्रदान करने वाली, थी। यहाँ पहाड़ों से झरने के रूप में होकर पानी जमीनी सतह तक पहुँचता है। बीच-बीच में आप पत्थरों से होकर बहने वाली नदी रूप में बहते हुए स्वच्छ जल को देख सकते हैं। कहीं-कहीं आप इसे अनुभव भी कर सकते हैं परंतु मंदिर से 1.5 से 2 किलोमीटर की दूरी में आप इन्हें दूर से ही देख पाएंगे, कभी-कभी पानी का बहाव तेज होने एवं जीव-जंतुओं का खतरा होने के कारण वहाँ जाना वर्जित होता है। जैसा कि मैंने बताया कि जब तक डोर नहीं खिंचेगी आप वहाँ नहीं जा सकते। तो ऐसा ही कुछ इस बार मेरे साथ हुआ, इस बार बाबा के दर पहुँचना बिल्कुल अप्रत्याशित था। क्योंकि कुछ भी पूर्व नियोजित नहीं था।

बारिश के कारण रास्ता बहुत ही खराब हालत में था, एक डर था कि कैसे पहुँचेंगे, मगर कहते हैं न जब उसने बुलाया है तो वो कुछ नहीं होने देगा। तो बस सभी मुश्किलें पार करते हुए हम पहुँच गए अपनी मंज़िल तक। वहाँ पहुँच कर हमने अपने हाथ पैर धोए और बाबा का प्रिय भोग बेसन के लड्डू (प्रसाद के तौर पर) लिए और चल दिए बाबा के दर्शन के लिए। जै

से ही दर्शन करने के लिए पहुँचे, तो पाया बहुत ज्यादा भीड़ है। तो मैंने, अपने भैया जिनके साथ मैं वहाँ पहुँची, उन्हें कहा कि इतनी भीड़ है दर्शन कैसे होंगे । तो उन्होंने मुझे कहा कि दर्शन भी होंगे और बहुत अच्छे से होंगे, मगर मैं तो फिर भी इसी कश्मकश में थी कि इतनी भीड़ में दर्शन कैसे ही होंगे? मगर आप यकीन नहीं करेंगे जैसे ही हम दर्शन के लिए आगे बढ़े हमारे आगे से सारी भीड़ ऐसे हटी जैसे धूप निकलने पर काले बादल छट जाते हैं। और फिर जो दर्शन हुए उन्हें शब्दों में उतार पाना थोड़ा कठिन है।

जब मैं बाबा के दर्शन कर रही थी तब मेरे मन को जो सुकून, शांति और बाबा की उपस्थिति महसूस हुई वो सारे सुखों और रास्ते में मिलने वाली हर मुश्किल से बढ़ कर थी।

हनुमान मंदिर

‎तो इसी पर कुछ पंक्तियां याद आई हैं कि,

“हमने तुमको उतना देखा , जितना देखा जा सकता था
‎मगर इन दो आंखों से भला, कितना देखा जा सकता था।”

‎और दर्शन के पश्चात् हमने परिक्रमा की और फिर हम प्रसादी पाने के लिए गए, और इसके पश्चात् हम वहाँ थोड़ी देर ठहरे और अपने घर के लिए वहाँ से निकल आए।

‎इसके अतिरिक्त वहाँ की कढ़ी-कचौरी भी काफी प्रसिद्ध है। रास्ते में काले मुँह के बंदर (लंगूर) बड़े एवं छोटे, किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुँचाते हैं एवं मंदिर जाते समय इनके लिए भी केले, बिस्कुट या गुड़ एवं चना लेकर जाते हैं और इन्हें खिलाते हैं, जो कि मन को एक अलग ही संतुष्टि प्रदान करता है।
‎घर लौटते समय हमें बाबा से आशीर्वाद स्वरूप रास्ते में मिले दो मोर पंख।

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