Bangla Sahib Gurudwara Delhi
गुरुद्वारा बंगला साहिब- दिल्ली का गोल्डन टेम्पल
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दिल्ली के केंद्र में बसे कनॉट प्लेस में स्थित बंगला साहिब गुरुद्वारा यूँ तो कई मायनों में खास है। पर इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका उदार स्वभाव। जी हां, करीब साढ़े तीन सौ साल पुराना ये गुरुद्वारा सभी धर्मों के लोगों का खुले दिल और गर्मजोशी से स्वागत सत्कार करता है। इसका परिसर 24 घण्टे मुसाफिरों के लिए किसी घर की तरह खुला रहता है। संगमरमर ओर सोने के गुबंद से बनी गुरुद्वारे की अनोखी शैली, 24 घण्टे सेवा देने वाली भव्य रसोई, पवित्र जलाशय ये सब मिलकर इस गुरुद्वारे को और भी खास बनाते हैं। Gurudwara Bangla Sahib

बंगला साहिब गुरुद्वारा परिसर
गुरुद्वारे के परिसर में जाते ही सीढ़ियों के नीचे बनी नलियों से निकलता पानी खुद ही पैरों को साफ करने की क्षमता रखता है। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सामने अरदास स्थल है। शर्त बस इतनी है अंदर प्रवेश करने के बाद आपका सर ढका होना चाहिए वरना जगह-जगह खड़े सेवादारों की डांट आपको इत्मीनान से झेलनी पड़ सकती है। अरदास स्थल की भव्यता और शांति मोहित कर देने वाली है। सामने गुरु ग्रन्थ साहिब और उसके ऊपर लगा बड़ा-सा शाही झूमर अलौकिक अनुभव देता है और लगता है वाकई ये स्थल एक वक्त पर किसी राजा का महल रहा होगा।

गुरु ग्रन्थ साहिब की परिक्रमा करते ही पिछले दरवाजे से हम बाहर निकले। एक तरफ कुंड का पवित्र जल दर्शनार्थियों को दिया जा रहा था तो दूसरी तरफ घी से बना हलवे का प्रसाद। सामने ही सुंदर जल कुंड है जो किसी भी श्रद्धालु को अपनी तरफ आने का आमन्त्रण देता है।

तालाब के अंदर रंग-बिरंगी मछलियां इस तालाब की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं और हां, खास बात ये यहां तस्वीरें खींचना सख्त मना है। अगर आप यहाँ गलती से तस्वीर लेते मिल गए तो सेवादारों के गुस्से का शिकार हो सकते हैं और मोबाइल छीनने का भी खतरा हो सकता है, तो सावधान रहिएगा।

24 घंटे लंगर सेवा
परिसर में आगे बढ़ने पर लंगर सेवा दिखी। इस लंगर के निस्वार्थ भाव से आसपास के सैंकड़ों-हज़ारों जरूरतमन्दों का पेट पलता है। श्रद्धालु भले ही इसे गुरु का प्रसाद समझते हों पर गरीब बेसहारा लोगों के लिए ये पोष्टिक भोजन किसी वरदान से कम नहीं। दाल और रोटी के इस लंगर में ज़ायक़ा उतना ही है जितना किसी मां के हाथ में होता है। आश्चर्य की बात तो ये है कि ये लंगर सेवा 24 घण्टे चलती है और तो और इसे बनाने के लिए किसी खास रसोइए को नहीं रखा गया है बल्कि सेवा भाव रखने वाले लोग खुद से पूरा भोजन तैयार करते हैं और परोसते भी हैं।

यहाँ की सबसे खास बात यही कि किसी काम के लिए कोई किसी को आदेश नहीं देता बल्कि सब अपने इच्छा भाव से काम करते हैं। यही तो इस गुरुद्वारे को और भी अनोखा बनाता है। इस तरह का मैनेजमेंट बिना किसी नियंत्रण के, ये देखना हमारे लिए भी आश्चर्य से कम नहीं था। Gurudwara Bangla Sahib


बंगला साहिब का इतिहास
बंगला साहिब का इतिहास इसे और भी समृद्ध बनाता है। ऐसे तो दिल्ली में कई जाने पहचाने नामी गुरुद्वारे हैं लेकिन इनमें से सबसे खास है सिखों के आठवें गुरु श्री गुरु हरिकृष्ण जी से सम्बंधित ये स्थल। आज सिखों में बेहद पवित्र माने जाने वाला ये गुरुद्वारा बंगला साहिब 1664 के दौर में मिर्जा राजा जय सिंह का बंगला हुआ करता था। बात उन दिनों की है जब दिल्ली शहर में हैजा और चेचक की महामारी फैली हुई थी। तब गुरु साहिब ने यहां आकर हजारों लोगों की सेवा-सत्कार किया था। ऐसा माना जाता है कुंड के जल में अपने चरण डाल कर गुरु हरिकृष्ण ने जल को आरोग्य बनाया जिसके बाद इस जल को पीकर लोग रोगमुक्त होने लगे। मान्यता है कि गुरु साहिब ने ही यहां इस प्याऊ की शुरुआत की थी, जिसका जल आज लोग विदेशों तक ले जाते हैं। गुरुद्वारे के दूसरे छोर पर हमें एक म्यूजियम दिखा जो फिलहाल बन रहा है। कुछ समय बाद सिख धर्म को प्रदर्शित करने वाला ये म्यूजियम आम जनता के लिए भी खुल जाएगा।

कहा जाता है यदि आप अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर को नहीं देख पाए तो इस गुरुद्वारे को देख लीजिए ये स्वर्ण मंदिर की एक छवि माना जाता है। इसे दिल्ली का गोल्डन टेम्पल भी कहा जाता है। इसके प्याज जैसे आकार के सोने के गुबंद और संगमरमर का परिसर आँखों को अपनी ओर खींच ही लेता है। दिल्ली में रह कर इस जगह नहीं आये तो क्या ही दिल्ली में रहना।


बंगला साहिब गुरुद्वारा सिर्फ एक गुरुद्वारा नहीं बल्कि दिल्ली का एक प्रमुख टूरिस्ट स्पॉट भी है। सेन्ट्रल दिल्ली का ये मशहूर गुरुद्वारा काफी बड़े एरिये में फैला हुआ है।
यहां आने के लिए राजीव चौक मेट्रो सबसे पास पड़ेगा। मेट्रो से रिक्शा लेकर आसानी से बंगला साहिब गुरुद्वारे तक पहुंचा जा सकता है। इस गुरुद्वारे की सुंदर बनावट आपको दूर से ही नजर आने लगेगी। लेकिन जब भी यहाँ यहां आएं तो लंगर का लुत्फ़ जरूर उठाएं।
Research by Nikki Rai Edited by Pardeep Kumar





